शंखपुष्पी एक ऐसा पौधा है जिसे हमने ज्यादातर जंगलों में ही देखा है ये पौधा कही भी अपनी जगह बना लेता है इसको न पानी की जरूरत है न ही देखभाल की। अगर हम कहें कि इसकी खेती करके लाखों रुपए कमाये जा सकते हैं तो आप भी सोच में पड़ जाएगें की क्यों ऐसे पौधे की खेती की बात की जा रही है जो केवल एक जंगली पौधा है। इसकी खेती करके क्या लाभ होगा?
तो हम आपको बता दें कि ये जंगली पौधा आपके बहुत फायदे का है। तो चलिए जानते है इस जंगली पौधे के बारे में….
शंखपुष्पी के पौधे का गुण और पहचान
शंखपुष्पी (वानस्पतिक नाम कोंवोल्वुलुस प्लूरीकॉलिस ) एक आयुर्वेदिक पौधा है। इसमें शंख के समान दिखने वाला सफेद पुष्प होता है! इसलिए इसे शंखपुष्पी कहते हैं। इसे क्षीरपुष्प (दूध के समान सफेद फूल वाले), ’मांगल्य कुसुमा’ (जिसके दर्शन से मंगल माना जाता हो) भी कहते हैं। यह सारे भारत में पथरीली भूमि में जंगली रूप में पाया जाता हैं। पुष्पभेद से शंखपुष्पी की तीन जातियां बताई गई हैं। सफेद, रक्त, नील पुष्पी। इनमें से सफेद पुष्पों वाली शंखपुष्पी ही औषधि मानी गई है। शंखपुष्पी के क्षुप प्रसरणशील, छोटे-छोटे घास के समान होते हैं।
फूल हल्के गुलाबी रंग के संख्या में एक या दो कनेर के फूलों से मिलती-जुलती गंध वाले होते हैं। फल छोटे-छोटे कुछ गोलाई लिए भूरे रंग के, चिकने तथा चमकदार होते हैं। बीज भूरे या काले रंग के एक ओर तीन धार वाले, दूसरी ओर ढाल वाले होते हैं। बीज के दोनों ओर सफेद रंग की झाई दिखती है। मई से दिसम्बर तक इसमें पुष्प और फल लगते हैं। शेष समय यह सूखी रहती है। गीली अवस्था में पहचानने योग्य नहीं रह पाती। सफेद पुष्पा शंखपुष्पी के क्षुप दूसरे प्रकारों की अपेक्षा छोटे होते हैं तथा इसके पुष्प शंख की तरह आवर्त्तान्तित होते हैं।
शंखपुष्पी के प्रयोग
शंखपुष्पी एक प्रकार की जड़ी-बूटी है जो सामान्यतौर पर गर्म और नमी वाले इलाकों में ज्यादा पाई जाती है। इसकी हरी पत्तियों और फूलों से बने पाउडर व रस का प्रयोग कई रोगों में लाभदायक होता है। आयुर्वेद में ब्रेन के लिए बनने वाली टॉनिक इत्यादि में यह मुख्य घटक का काम करती है। दिमागी कमजोरी, याददाश्त बढ़ाने में शंखपुष्पी बहुत कारगर औषधि का काम करती है। क्षेत्र के किसान जो अतिरिक्त मुनाफा कमाना चाहते हैं उनका रुझान अब इसकी खेती की ओर ज्यादा है। शंखपुष्पी कीमत 2 हजार रुपए किलो है तथा प्रति पौधा 25 रुपए बिकता है। वर्तमान में करीब 50 हेक्टेयर तक इसकी खेती करवाई गई जो काफी कारगर सिद्ध रही। शंखपुष्पी की खेती को आगे 100 से 200 हेक्टेयर तक बढ़ाया जाएगा ताकि क्षेत्रीय किसानों को अतिरिक्त आय हो। शंखपुष्पी की खेती के लिए किसानों को अतिरिक्त पानी की जरूरत नहीं रहती।
कम पानी में भी यह फसल अपना सही आकार ले लेती है। इस फसल में कीड़े इत्यादि लगने की संभावना भी बहुत कम रहती है। अक्सर पढ़ाई में कमजोर रहने वाले बच्चों के लिए शंखपुष्पी की पत्ती और तना के इस्तेमाल की सलाह दी जाती है। इसके लगातार इस्तेमाल से बच्चों की बुद्धि तीक्ष्ण और शरीर चुस्त-दुरुस्त रहता है। शंखपुष्पी को शक्तिशाली मस्तिष्क टॉनिक, प्राकृतिक स्मृति उत्तेजक, और एक अच्छी तनाव दूर करने की औषधी माना गया है। इसकी पत्तियों का इस्तेमाल अस्थमा के लिए किया जाता है। इसे अल्सर और दिल की बीमारी आदि के लिए भी बेहतरीन माना जाता है।
Dr. (Vaidhya) Deepak Kumar
Adarsh Ayurvedic Pharmacy
Kankhal Hardwar
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