आजकल घरों में खाना पकाने के लिए रिफाइंड तेल का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। बाजार में सूरजमुखी, सोयाबीन, राइस ब्रान और अन्य प्रकार के रिफाइंड तेल अलग-अलग ब्रांडों के नाम से उपलब्ध हैं। इनके अत्यधिक प्रसंस्करण और सेवन को लेकर समय-समय पर स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच चर्चा होती रही है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि तेल का चयन करते समय किन बातों का ध्यान रखा जाए।
रिफाइंड तेल तैयार करने की प्रक्रिया
वनस्पति तेलों को रिफाइन करने की प्रक्रिया में कई चरणों से गुजारा जाता है। इस दौरान तेल से रंग, गंध, अशुद्धियां और अन्य अवांछित तत्व हटाए जाते हैं। इसके लिए औद्योगिक स्तर पर विभिन्न प्रक्रियाओं और प्रसंस्करण पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि यह कहना सही नहीं है कि रिफाइनिंग के दौरान इस्तेमाल होने वाले सभी रसायन जहरीले होते हैं या कि रिफाइंड तेल अपने आप में जहर बन जाता है। तेल की प्राकृतिक गंध और स्वाद कम होने के कारण कई लोगों को रिफाइंड तेल पसंद आता है। वहीं, पारंपरिक रूप से इस्तेमाल होने वाले सरसों, मूंगफली, तिल या नारियल जैसे तेलों में अपने प्राकृतिक स्वाद और गंध मौजूद रहते हैं।
कौन सा तेल बेहतर है?
स्वास्थ्य की दृष्टि से किसी एक तेल को सभी लोगों के लिए सबसे अच्छा बताना उचित नहीं है। सरसों, मूंगफली, तिल, नारियल और अन्य खाद्य तेलों की पोषण संरचना अलग-अलग होती है। विशेषज्ञ सामान्यतः तेल का सीमित मात्रा में सेवन करने और एक ही प्रकार के तेल पर निर्भर रहने के बजाय संतुलित आहार पर जोर देते हैं।
तेल में मौजूद वसा शरीर के लिए आवश्यक होती है, लेकिन इसकी मात्रा और प्रकार महत्वपूर्ण हैं। विशेष रूप से संतृप्त वसा और ट्रांस फैट का अत्यधिक सेवन हृदय स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इसलिए तेल खरीदते समय लेबल पर ट्रांस फैट, संतृप्त वसा और अन्य पोषण संबंधी जानकारी देखना उपयोगी है।
पाम तेल को लेकर भी जरूरी सावधानी
पाम तेल का इस्तेमाल खाद्य उद्योग में व्यापक रूप से होता है। लेकिन यह कहना सही नहीं है कि पाम तेल में सबसे ज्यादा ट्रांस फैट होता है या इसका सेवन करने वाला व्यक्ति निश्चित रूप से हृदय रोग से मरेगा। ट्रांस फैट और हृदय रोग के बीच संबंध जरूर स्थापित है, लेकिन सभी पाम तेलों को ट्रांस फैट का प्रमुख स्रोत मानना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है। वास्तव में स्वास्थ्य के लिए अधिक महत्वपूर्ण यह है कि खाद्य पदार्थ में औद्योगिक ट्रांस फैट की मात्रा कितनी है और कुल वसा का सेवन कितना किया जा रहा है।
HDL को लेकर भी भ्रम से बचें
HDL को आमतौर पर ‘अच्छा कोलेस्ट्रॉल’ कहा जाता है। हालांकि HDL केवल तेल खाने से शरीर में नहीं बनता। शरीर स्वयं भी कोलेस्ट्रॉल का निर्माण करता है और HDL का स्तर कई कारकों पर निर्भर करता है। इसलिए यह दावा करना कि शुद्ध तेल खाने से HDL बढ़ेगा और व्यक्ति जीवनभर हृदय रोग से सुरक्षित रहेगा, वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है।
तेल का चुनाव कैसे करें?
खाना पकाने के लिए तेल का चयन करते समय उसकी गुणवत्ता, मात्रा और भोजन की पूरी संरचना को ध्यान में रखना चाहिए। सरसों, मूंगफली, तिल, सोयाबीन, सूरजमुखी या अन्य खाद्य तेलों का सीमित और संतुलित इस्तेमाल किया जा सकता है। बार-बार गर्म किए गए तेल से बचना भी महत्वपूर्ण है।
स्वास्थ्य के लिए केवल तेल का प्रकार ही जिम्मेदार नहीं होता। इसके साथ नमक, चीनी, अत्यधिक तला भोजन, शारीरिक सक्रियता, वजन, धूम्रपान और पूरी जीवनशैली भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए रिफाइंड तेल को ‘जहर’ बताने या किसी एक पारंपरिक तेल को सभी बीमारियों से बचाने वाला मानने के बजाय संतुलित मात्रा, बेहतर गुणवत्ता और समग्र आहार पर ध्यान देना अधिक वैज्ञानिक और सुरक्षित दृष्टिकोण है।
Dr. (Vaidhya) Deepak Kumar
Adarsh Ayurvedic Pharmacy
Kankhal Hardwar
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